रविवार, 30 जुलाई 2017

क्षणिका

कसौटियों पर तप तप कर
जीवन हुआ कुंदन - कुंदन
सीले सपनों से फूटी कोपलों पर
रीझे मन मधुकर वृन्दावन
#वन्दना

रविवार, 6 मार्च 2016

"-आदमी को भी मयस्सर नहीं इंसा होना !!"

आखिर 

किस चाहना में 
उपेक्षित 
होती जा रही है 
मानवीयता ?
संवेदनाओं में 
पैशाचिकता का 
उन्मुक्त प्रसार...
और भगवानों की 
लम्बी कतार 
का निरीह हो जाना 
ड़बडबाती आँखों से 
बुदबुदाती दुआओं 
का भी पानी हो जाना 
अब तो हो 
कवायद शुरू 
मानवीय चारित्रिक...
मूलभूत तत्वों को
बचाए रखने की 


"-आदमी को भी मयस्सर नहीं इंसा होना !!"

गुरुवार, 3 मार्च 2016

क्यूँ चुपचाप सुने माता ?








धिक्कार और उलहाना...
क्यूँ चुपचाप सुने माता ?

राम-कृष्ण गौतम का भारत
ज्योतित ज्ञान प्रकाश अविरत..
चक्र सुदर्शन की रही छाया
गीता ने यहीं अमृत बरसाया...
फिर जरासंध छल बल दिखलाता...



धिक्कार और उलहाना...

क्यूँ चुपचाप सुने माता ?

क्रान्ति स्वर ऐसे नहीं हों...
अवनति जिनमें छिपी हो...
व्यर्थ सभी क्या पुण्य पुरातन ?
क्या ऐसे आएगा परिवर्तन ?
गहन तमस में सुप्त न हो मानवता...



धिक्कार और उलहाना 
क्यूँ चुपचाप सुने माता ?

#वन्दना...

शनिवार, 23 मई 2015

व्यक्तित्व !!!

व्यक्तित्व में उपजती 
विशेषतायें 
कुछ घोषित 
कुछ आरोपित 

व्यवहार में झलकती 
सतही  
अपर्याप्त 
कृत्रिमता 
और उनका 
यदा कदा संघात बनना 

परिस्थितियां 
देती हैं प्रताड़ना 
लांछन 
कष्ट 
व पीड़ा 

अभाव पनपते हैं 
खरपतवार से...  
अंदरुनी भावात्मक 
 बाहरी विस्तृत  

शांत भाव 
वहन  करने का 
निष्क्रिय कर देता है 
ओज अधिकारों का 

पम्परागत संयम 
सहानुभूति और करुणा 
के साथ 
असंभव हो उठती है 
सहनशीलता 
सहज शालीनता 

अपरिचित उदासीन  भाव
 जन्म लेते हैं  
प्रकृति के 
सृष्टि  के 
और 
व्यक्तित्व के !!!

सोमवार, 13 अक्तूबर 2014

रात की बाती.... डूब गयी !





टिमटिमाते 
डबडबाते
साँझ की बाती 
डूब गयी


फिर गहन 

अमावस 

अंधियारे

मन के गहरे 

गलियारे


जलते सपनों का 

दीप जला

इक मन पिघला 

कुछ रीत चला


धीमे धीमे 

सन्नाटे में 

कोई भेद खुला 

और दूर 

मुँडेरी पर बैठी 

इक याद हंसी


रीते मन में 

इक हूक उठी 

इक टीस उठी

इक पत्ता टूटा 

उस टहनी से 

फिर एक नया 

सपना सा गिरा


और टूटे कांच की

किरचों  से 

सपनों का

आशा दीप जला 

किरणों का 

रौशन जाल बुना



कुछ पल सरके 

कुछ मन दरके 

तारों का जाल 

भी टूट गया 


सपने जलाये

धीमे धीमे 

फिर रात भी 

थक कर 

डूब गई



जलते सपनो 

के दीये में 

रात की बाती 

डूब गयी 

मंगलवार, 13 मई 2014

ममता नाद !








मातृ दिवस से परे … 


आज मेरा नमन ममत्व के उन इंद्रधनुषी रंगों को जो अंतःस्थल के 

अभावों को रंग कर जीवंत कर देते हैं प्रकृति का अधूरापन !

जिनकी कल्पनाओं में कसकती है वात्सल्य रस की सकुचाई सी जलधार 

जिससे खिल उठते हैं जाने कितने ही शुष्क मुरझाये पुष्पहार !


संतप्त सजल नेह नयन

अनछुआ ममतामय सपन


उर के दग्ध दीर्घ उच्छ्वास 

पीड़ा का मधुमय रुंधा हास


कंटक कठोर जुग की रीत

रही अकिंचन वात्सल्य प्रीत


झरते हरसिंगार से झर झर

सपन पनीले दुसाध्य दुष्कर


हा ! टूट पड़ो भू पर अम्बर

क्यूँ रही धरा शोषित बंजर


प्रकृति प्रदत्त नारी का अधिकार

परम पुनीत वात्सल्य अविकार 


सकुचाये क्यूँ ईश्वरीय उपहार 

उर में छुपाये दारुण झंकार 


अबोली माँ का हर्ष विषाद 

सजल नयन में ममता नाद !

शुक्रवार, 7 मार्च 2014

वक़्त...





वक़्त ! 

मुट्ठी में 
रेत सी  
फिसलती   
यादें और 
छूटे साथ  
मानो 
कांच की 
किरचियों पर 
खड़े हम 
तुझे तकते हैं

भ्रम नहीं 
रौशनी 
यकीनन 
मगर 
भ्रमित करते 
इंद्रधनुषी रंग
सजता है  
जिनसे एक  
सपनीला  
आसमान 
लहरों के 
ज्वार पर  
हम अपनी 
नैय्या खेते हैं  


कुछ
टूटे बिखरे  
कुछ 
छूटे - पल 
कुछ 
पुकार विकल 
कुछ 
मनुहार सजल 
कुछ दायरे  
निरर्थक...     
मन की अटल 
गहराइयों में 
जा बसा मौन  
विराट मरुस्थल 
की प्यास सा
अक्सर  
दरकाता है ये 
गर्वित खंडहर  
और हम 
एक स्वर की 
चाहना में 
अक्षर मोती 
पिरोते हैं 

गुरुवार, 27 फ़रवरी 2014

आत्मा में बसे आराध्य को....










मन के भीतर मंदिर शिव का

मैं क्या मंदिर जाऊँगी 



आर्द्र नयन से सींचा प्रतिपल 


मैं क्या जल चढ़ाऊँगी 



वेद विधान की देव - वन्दना 

अज्ञानी मैं हूँ अकिंचना 

मिला न कोई बिल्ब धतूरा

हृदय कलिका चढ़ाऊँगी 



अंध तमस में जीवन सारा 

भस्म करो हे देव मलिनता

श्रद्धा और भक्ति की शक्ति 

रोम रोम में बसाऊँगी 



बुधवार, 19 फ़रवरी 2014

सांझ ढले.....








सांझ ढले जब पंछी चहके , दहका सूरज भी कुम्हलाया  
विस्मृति की खिड़की से गुपचुप ,यादों का बादल घिर आया 

पाषाण हृदय के कारा में , हो तृषित जरा जो मन घबराया 
मूक अभागी तृष्णा पथराई , रेतीला दरिया बह आया 

स्वप्न शेष पर निंदिया रूठी ,कोरों में खारा जल आया  
न चेहरा दिखता न हीं सपन , दरपन दरपन भी धुन्धलाया  

बुधवार, 5 फ़रवरी 2014

अहले नज़र यूँ रब को बना लो



अहले नज़र यूँ रब को बना लो 
गमगीं दिल के ग़म अपना लो 

चश्म ए पुरनम छलकी जाए 
तश्ना लब थे प्यास बुझा लो 

जब अहसास भी सर्द लगें तो 
एक सुलगता ख्वाब जला लो 

दुनिया के रंजो गम बेज़ा 
हँसते गाते फुरसत पालो

ज़ुल्मो दहशत फैलाने वालों    
बेहतर इश्क का शिकवा गिला लो 

आँखों की बरसात थमे तो    
दीप 'दुआ' का एक  जला लो





अहले नज़र  = कद्रदान 
चश्म ऐ पुरनम  = आसुंओ से भरी हुई आँखें 
तश्ना लब = होठों की प्यास